मोदी सरकार ने दिया योगी सरकार को सबसे ब’ड़ा झ’टका, किया…

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लखनऊ. उप्र में विधानसभा के उपचुनावों में जीत के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मास्टर प्लान बनाया था। लेकिन, योगी की योजना पर मोदी सरकार ने ही पानी फेर दिया है। उप्र की 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के फैसले को केंद्र ने गैर कानू:नी और संविधान की भावनाओं के विपरीत बताया है। केंद्र ने कहा कि उप्र सरकार इस फैसले को वापस ले। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद्र गहलोत का कहना है कि नियम के मुताबिक़ कोई भी सरकार किन्ही जातियों को एससी कैटेगरी में न तो शामिल कर सकती है और न ही उसे बाहर कर सकती है। जातियों को एससी में शामिल करने या बाहर निकालने का अधिकार सिर्फ संसद में कानून बनाकर ही किया जा सकता है।

मास्ट स्ट्रोक माना जा रहा था फैसला

उप्र की 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के योगी के फैसले को उपचुनावों के लिए मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा था। योगी आदित्यनाथ के इस फैसले का बसपा,सपा और कांग्रेस न तो समर्थन कर पा रही थीं और न ही विरोध। क्योंकि कोई भी पार्टी उप्र की इन 17 जातियों की करीब 13 फीसद आबादी का विरोध उठाने का जोखिम नहीं लेना चाहती थीं।

लेकिन, विपक्ष के इस असमंजस को केंद्र ने दूर कर दिया है। मंगलवार को राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि यूपी सरकार से इस निर्णय को वापस लेने की मांग केंद्र ने की है, क्योंकि यह कानूनी रूप से उचित नहीं है। केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि यह पूरी तरह से अ’संवैधानिक है। मंत्री ने कहा कि यह आदेश संसद का विशेषाधिकार है और यह किसी भी विधि न्यायालय में मान्य नहीं है।

इसके पहले बसपा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि यूपी सरकार ने तीन दिन पहले इन 17 जातियों को ओबीसी की लिस्ट से बाहर कर दिया और अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट देने के लिए कहा है जो कि पूरी तरह से गैर संवैधानिक है। सतीश चंद्र मिश्रा के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री थवरचंद गहलोत ने कहा कि किसी जाति को किसी अन्य जाति के वर्ग में डालने का काम संसद का है।

17 जातियों से जुड़ा है मामला

योगी सरकार ने उप्र की 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का आदेश जारी किया था। इन 17 जातियों में कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिन्द, भर, राजभर, धीमर, वाथम, तुरहा, गोडिय़ा, मांझी और मछुआरा शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट स्थिति साफ कर चुका है। कोर्ट ने इसी तरह के एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि ज़्यादा वोट या सीटें पाकर सरकारें जनप्रिय तो हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें काम नियम-क़ानून व संविधान के मुताबिक़ ही करने का अधिकार है। इसके लिए विहित प्रक्रिया से ही गुजरना होगा।

अब क्या करेगी योगी सरकार

योगी सरकार यदि सचमुच में इन 17 जातियों को ओबीसी से एससी में लाना चाहती है तो वह इस आशय का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजेगी। केंद्र उस पर विचार करते हुए उस पर कानून बनाएगा। इस कानून को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा। फिर यह कानून का रूप लेगा। तब तक योगी सरकार इन जातियों के लिए अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र (कोर्ट के आदेश के अधीन) तो जारी कर सकती है, लेकिन इस फैसले पर अमल के लिए कोई भी प्रक्रिया तभी शुरू हो सकेगी, जब उच्च न्यायालय का निर्णय पक्ष में आ जाए।

सियासी ताप से जलती रहीं जातियां

17 अति पिछड़ी जातियां लंबे समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं। 1957 के पहले यह सभी जातियां अनुसूचित जाति में शामिल थीं। इन्हें अनूसूचित जाति का प्रमाण पत्र भी मिलता था। लेकिन एक फैसले के बाद इन्हें अजा का प्रमाण पत्र मिलना बंद हो गया। 2003 से इस मुद्दे को लेकर आंदोलन चल रहा है। दलित शोषित वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष संतराम प्रजापति इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। इनके मुताबिक साइमन कमीशन की सिफारिश पर 1931 में अछूत जातियों का सर्वे (कम्प्लीट सर्वे ऑफ ट्राइबल लाइफ एंड सिस्टम) हुआ था। तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया जेएच हट्टन की रिपोर्ट में 68 जातियां अछूत कही गयीं। 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत इन्हें विशेष दर्जा मिला। इसके बाद भारत सरकार के तत्कालीन सचिव ने सभी राज्यों से उन जातियों की रिपोर्ट मांगी, जो मुख्यधारा से अलग हों। इनमें उप्र की 17 जातियां पाई गईं। इनमें कुम्हार और प्रजापति को शिल्पकार और बाकी 15 को मझवार उपजाति में रखा गया। इन सभी को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र दिए जाते थे। लेकिन1957 में समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन सचिव ने एक सर्कुलर जारी कर दिया कि यह सूची अब प्रभाव में नहीं है। जिसके आधार पर अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना लगभग बंद हो गया। फिर 1996 में पूरी तरह रोक लग गई।

सपा-बसपा भी उठा चुकी थीं कदम

सूबे की 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल करने के लिए सपा और बसपा भी अपने कार्यकाल में कदम उठा चुकी थीं, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिली। 2007 में तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 14 जिलों का सर्वे कराकर केंद्र सरकार को भेजा। सरकार ने पूरे प्रदेश की रिपोर्ट मांगी। तब तक कार्यकाल समाप्त हो गया।11 अप्रेल 2008 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने केंद्र सरकार से प्रस्ताव वापस मांगा। कारण पूछने के बाद कोई कदम नहीं उठाया गया। फरवरी 2013 में अखिलेश सरकार ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा, लेकिन 14 मार्च 2014 को रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद प्रस्ताव को हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई, जो अभी विचाराधीन है।

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